

Neem Ka Ped
A**.
Must read
- ऊपर किए गए हाइलाइट्स से पुस्तक के विषय के बारे में थोड़ा बहुत तो अंदाजा लग ही गया होगा। ये किताब गांव के सामाजिक और राजनीतिक जीवन की तस्वीर हमारे सामने प्रस्तुत करता है। लेखक ने असल जिंदगी की कठिनाइयों और संवेदनशील मुद्दों को अदभुत तरीके से प्रस्तुत किया है।- किताब की शुरुआत आजादी के थोड़ा पहले के समय से होती है जिसमे कहानीकार है नीम का पेड़। वही पेड़ जिसे किताब के मुख्य पात्र बुधई ने अपने बेटे सुखई के जन्मदिन पर लगाई है जिससे बेटे के साथ साथ बुधई की भावनाए इस पेड़ से भी जुड़ जाती है।- ये कहानी है एक बाप की बेटे और प्रकृति के प्रति प्रेम की। कहानी आपको सत्ता और उसके नशे से आपको परिचित करवाती है। किताब में लिखे कुछ लाइंस जैसे - “सत्ता का अपना एक नशा होता है और अपनी जात भी। जो भी उस तक पहुंचता है उसकी जात का ही हो जाता है।” सोचने पर मजबूर कर देती है । किताब के बारे में ज्यादा लिखना स्पॉयलर हो जायेगा जो आपके पुस्तक पढ़ने के अनुभव को खराब कर देगा।- ये किताब आपको सोचने पर मजबूर करती है पुस्तक की लंबाई ज्यादा न होने के कारण आप इसे 2 दिन में आराम से खत्म कर सकते है। यह किताब आपको नीम के पेड़ की अद्भुत दुनिया में ले जायेगा जो आपको पुस्तक को आगे पढ़ने पर मजबूर करेगा। यदि आप हिंदी में कोई बेहतरीन किताब खोज रहे है तो आप राही मासूम रज़ा जी की लिखी इस किताब को जरूर पढ़े।- आपका इस किताब को लेकर क्या विचार है क्या आपने ये किताब पढ़ी है यदि हां तो आपको किताब कैसी लगी यदि नही तो पढ़कर अपनी राय मुझसे जरूर साझा कीजिएगा। मुझे आप सबके राय और पुस्तक से जुड़े अनुभव का इंतजार रहेगा।
M**
Better than expected
It's just around 90 pages, worth to try.
T**I
नीम का पेड़ राजनेतिक मुद्दे का उपन्यास
यह विशुद्ध रूप से राजनेतिक उपन्यास है जिसमे कहानी के पात्र अपने राजनीतिक लाभ और निजी स्वार्थ के चलते कुछ भी कर सकते है। भाषा उर्दू मिश्रित है जिसको समझने में वक्त लगता है। कुल पृष्ठ 91 है। लेखक ने कहानी को नीम के पेड़ के माध्यम से कही है। कहानी दो पीढ़ियों की है जो 1946 से आरंभ होती है। मदरसा खुर्द नाम के गांव को मद्देनजर करके लिखी गई है। जिसमें जमींदार अली जामिन खां, मुसलीम मियां, बुधई (बुद्धिराम) से शुरू होती हुई अगली पीढ़ी के सामिन मियां, सुखीराम, रामलीखावन यादव के इर्द-गिर्द चलती है।पृष्ठ संख्या ३१/३२ पर कुछ पंक्तियां है"नारियल के पेड़ों की छाँव बेचनेवालो/बरगदों को मत काटो/पीपलों को मत छेड़ो/इमलियों को जीने दो/इनकी पत्ती-पत्ती पर धूप पर सुखाती है/अपने नाम लिखती है..."वहीं पृष्ठ संख्या ५३ पर लिखा है।"कब कौन किसका दुश्मन हो जाए, फिर किसकी दुश्मनी कब किसको किसका दोस्त बना जाए। राजनीति के रिश्तों का ताना-बाना ही कुछ ऐसा होता है, उसे सिर्फ़ वही समझ सकते हैं जो राजनीति में थोड़ा-बहुत दखल रखते हों। वर्ना आप तो सर ही पीटते रह जाएँगे।"पृष्ठ संख्या ५६ पर लिखा है।"ये सरकार चलाना आपसी रंजिश के अलावा कुछ नहीं होता है। अब तो सुनने में ये भी आने लगा है कि आपसी रंजिश से लोग सरकारें तक गिरा देते हैं। देखें अब इनकी आपसी रंजिश क्या रंग लाती है!"
N**T
Want ultimate liberation go through books
It's my first noval of rahi massom raja .his writting is owsom the way story narrated it gives real feel. I felt to finish it in two shifts but because of the quality stroy I have to finish it in one shift must buy
A**R
About society
Good but not complete my expectation.
A**L
He has done it
It is a heart touching story of a clash of values. The author has touched the right cord. The setting has changed, but the message is still relevant. The story of Budhiya will keep you engoresed, and if you are from the generation of the 50s and 60s, you will be able to relate to the story.
D**T
समीक्षा
पुस्तक समीक्षा - नीम का पेड़लेखक - राही मासूम रजा जैसा कि आप सभी को पता है कि मुझे लिखने का जितना शौक है, उससे बहुत ज्यादा पढने का शौक है। सच्ची बात है कि पढने का शौक ने ही मुझे लेखक बनाया है। अभी कुछ पुस्तकें खरीदी थीं। तथा उन्हें धीरे धीरे समय निकाल कर पढ रहा हूँ। कल ही श्री राही मासूम रजा द्वारा लिखित उपन्यास 'नीम का पेड़' को पूरा पढा है। कथानक के तौर पर यह एक गांव की कहानी है। प्रेम, द्वेष और राजनीतिक उठापटक की कहानी है। इस कहानी का वक्ता वह नीम का पेड़ है जिसे बुधई ने अपने बेटे सुखिया के जन्म के अवसर पर लगाया था। देश आजाद हो चुका था। बुधई का एक ही सपना था कि उसका बेटा पढ लिखकर बड़ा आदमी बने। फिर राजनैतिक उठापटक और षड्यंत्रों की कहानी है। राजनीति में कोई भी किसी का मित्र नहीं है और न हीं कोई किसी का शत्रु। नीम का पेड़ हो रहे बदलावों का स्पष्ट वक्ता है। वह निष्पक्ष वक्ता है। किसी से पक्षपात नहीं करता। समाज के चारित्रिक पतन को बखूबी उजागर करता है। पुस्तक की भाषा बड़ी सरल है। पर उक्तियां बड़ी गंभीर हैं। इन उक्तियों का अर्थ गहराई से विचार करने पर ही समझ में आता है। इस अच्छे उपन्यास को यदि आप जल्दी पढेंगे तो बहुत संभव है कि कथानक आपकी समझ में आ जाये। पर कथानक हमेशा साहित्य का एक भाग मात्र होता है। पूरा साहित्य नहीं ।इसलिये उचित है कि इस उपन्यास को बड़ी गहराई से पढा जाये। एक उदाहरण प्रस्तुत है - सांझ होते ही इंसान का साया बढने लगता है। और जब इंसान का साया उस इंसान से बहुत ज्यादा बड़ा लगने लगे तब समझ लेना चाहिये कि उस इंसान की किस्मत का सूर्य भी अस्त होने के करीब ही है। पुस्तक उद्देश्यपूर्ण है और पठनीय भी है।दिवा शंकर सारस्वत
R**L
This slim novel is a moving picture of UP
With his powerful pen, Rahi Masoon Raza paints the moving picture of post-independent UP, with villagers jumping in politics, whose only witness is the long-standing alone neem ka ped!!!!
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1天前
1 个月前